भूमिका
हिन्दी कहानी की भूमिका कहानी के जन्म का कोई ठोस या निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है. किन्तु यह निर्विवाद सत्य है कि यह मानव की प्राचीनतम कला उपलब्धि है। अपने गृहीत अनुभवों को दिलचस्प ढंग से कहने-सुनने की प्रवृत्ति ही इसका आधार है और यही कारण है कि जीवन के हर रंग उसमें प्रतिबिम्बत होते हैं या यूं कहें कि वह समयानुसार अपनी नई-नई आकृतियों का भी गठन करता रहता है। साथ ही यह भी निर्विवाद सत्य है कि वे ही कहानियाँ कालजयी या जीवित रह पाई हैं जिनमें सामान्य जन या समाज की संवेदना को संस्पर्श करने की क्षमता हो। ऐसी कहानियाँ बिना किसी बनाव श्रृंगार के पूरी संवेदना और आत्मीयता के साथ अभिव्यंजित होती है। हिन्दी कहानी एक रचनात्मक शैली है, जो किसी विषय को सामान्य रुप से प्रस्तुत करती है और इसे जीवन के विभिन्न पहलुओं से जोड़ती है। इस रचनात्मक शैली में, कहानी लेखक के मन में उठती हुई समस्याओं और प्रश्नों का समाधान भी निकालती है। हिन्दी कहानी का उद्भव वैदिक काल से माना जाता है। वैदिक साहित्य में कई ऐसी कहानियाँ हैं जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को संवेदना से जोड़ती है। उदाहरण के रूप में रामायण और महाभारत को लिया जा सकता है, जो वैदिक काल से ही लोकप्रिय रहे हैं, जिनमें से प्रत्येक एक रचनात्मक कहानी है। रामायण में अन्तर्कथाओं का समायोजन है, वहाँ पात्र और परिस्थितियाँ सजीव रूप में मिलते हैं। महाभारत इतिहास, धर्म और कल्पना की त्रिवेणी है। इसके कथासागर में भारतीय जीवन की समस्त मणियाँ समाहित हैं। वैदिक काल की कहानियों का उद्देश्य लोगों को धर्म और नैतिकता के संदेश से अवगत कराना था। पौराणिक कथाओं के प्रभाव ने लोक रुचि को कथाभिमुख किया, फलस्वरूप ये कथाएँ लोक संवेदना में रचने बसने लगीं और इनकी प्रेरणास्वरुप नई कथाओं की उद्भावना हुई। जातक कथाएँ भारतीय कथा परंपरा में विशेष महत्व रखती हैं। इनकी रचना ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी तक हुई होगी। जातक कथाओं से नये कथा-शिल्प की शुरुआत होती है। एक स्वतंत्र कथा से दूसरी कथा और उससे तीसरी कथा का जन्म होता है। 'कथासरित्सागर' और 'पंचतंत्र' की कथा शैली इसी से प्रभावित है। जातक कथाओं ने प्राचीन कथा तत्व को नयी कलात्मकता दी है। 'वृहत्कथा' का संस्कृत कथा साहित्य में महत् स्थान है। इसकी रचना गुणाढ्य नाम के किसी पंडित ने पैशाची भाषा में ईसा की प्रथम शताब्दी में की थी। इस ग्रंथ की कोई प्रति उपलब्ध नहीं है, वैसे इस ग्रंथ का उल्लेख बाण के 'हर्षचरित', दण्डी के 'काव्यादर्श', क्षेमेन्द्र की 'वृहत्कथामंजरी' और सोमदेव के 'कथासरित्सागर' में मिलता है। 'कथा सरित्सागर', 'वैताल पंचविंशतिका', 'शुक सप्तति' और 'सिंहासन द्वात्रिंशतिका' का संस्कृत कथा साहित्य में ऐतिहासिक महत्व है। जन-मानस को इन कथा-संग्रहों ने तो प्रभावित किया ही साथ ही प्राकृत और अपभ्रंश काव्यधारा को भी प्रभावित किया। इसके हिन्दी अनुवाद 'कथासरित्सागर', 'बैताल पचीसी', 'किस्सा तोता मैना' और सिंहासन बत्तीसी के नाम से प्रचलित हुए। मानवीय संवेदना के इतने धरातल हैं कि वह अपने चर-अचर में भी सक्रिय या प्रतिबिंबित पाता है। 'पंचतंत्र' और 'हितोपदेश' का रचनाकाल संभवतः तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी माना जाता है।
लेखक परिचय
डॉ. चन्द्रिका ठाकुर एसोशिएट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची
डॉ. कुमुद कला मेहता सहायक प्राध्यापक, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची
डॉ. नियति कल्प सहायक प्राध्यापक, विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग, राँची विश्वविद्यालय, राँची
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