अंततः लंबे इंतजार के बाद श्रीमती राधारानी की महिमा और लीलाएँ भाग दो प्रकट होने जा रहा है। मेरी पुस्तक श्रीमती राधारानी भाग एक में मैंने उल्लेख किया था कि मैं श्रीमती राधारानी भाग दो प्रकाशित करूँगा। तब से कई वर्ष बीत चुके हैं। समय-समय पर भक्तों ने मुझसे पूछा है कि यह पुस्तक कब प्रकाशित होगी। मैं उनसे कहता रहा कि जब श्रीमती राधारानी आशीर्वाद देंगी तभी यह पुस्तक प्रकट होगी।
इस भाग दो के लेख भाग एक के लेखों से थोड़े भिन्न होंगे। इसमें कुछ लेख श्रीमती राधारानी की छोटी-छोटी लीलाओं का वर्णन करेंगे और कुछ लंबे लेख ललित माधव, प्रेम सम्पुट, आनंद वृंदावन चम्पू और गोपाल चम्पू आदि से लीलाओं का वर्णन करेंगे। इन पुस्तकों में हमारे महान आचार्यों ने राधा और कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का बहुत ही रोचक ढंग से वर्णन किया है। इस पुस्तक में मैंने उन्हें बहुत ही सरल रूप में, जिस तरह से मैंने समझा है, वर्णित किया है। मुझे आशा है कि इस पुस्तक के लेख पाठकों को विषय की एक समग्र समझ प्राप्त करने में मदद करेंगे। तत्पश्चात् वे संबंधित लेखकों द्वारा लिखित मूल पुस्तकों को पढ़ सकते हैं। मूल लेखन को समझना इतना आसान नहीं है। लेकिन यदि आप राधारानी की कृपा से उन्हें ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे, तो आप विषय का बहुत आनंद लेंगे।
के मन से संदेह दूर करना आवश्यक है। मुझे आशा है कि यह पुस्तक पाठकों को यह समझने में मदद करेगी कि राधा और कृष्ण के बीच का प्रेम संबंध कितना शुद्ध और प्रामाणिक है।
"नव वृंदावन लीला" नामक लेख श्रील रूप गोस्वामी द्वारा रचित पुस्तक 'ललित माधव' के आधार पर तैयार किया गया है। यह लेख पुस्तक के विषय के कुछ भाग से संबंधित है, लेकिन उतना व्यवस्थित नहीं है जितना कि पुस्तक में वर्णित है। यह 'ललित माधव' पुस्तक श्रील रूप गोस्वामी ने नाटकीय प्रारूप में लिखी है। मैंने इसे कहानी के रूप में परिवर्तित किया है। लेख में वर्णन का क्रम मूल पुस्तक में वर्णित क्रम के समान नहीं है। मैंने विषय को अधिक सरलता से समझाने के लिए क्रम बदल दिया है। इस लेख के माध्यम से श्रील रूप गोस्वामी ने यह प्रस्तुत किया है कि कैसे श्री कृष्ण और श्रीमती राधा द्वारका में वृंदावन की लीलाओं से भिन्न रस का आनंद ले रहे हैं। इसमें वर्णित है कि श्री कृष्ण के द्वारका चले जाने के बाद, समय के साथ श्रीमती राधारानी, चंद्रावली, ललिता, विशाखा और चंद्रावली की चार प्रमुख सखियों सहित 16,108 गोपियाँ द्वारका पहुँची। द्वारका में उन्हें अन्य नामों से जाना गया। राधारानी सत्यभामा के रूप में प्रकट हुई और चंद्रावली रुक्मिणी के रूप में प्रकट हुई। वृंदावन में राधारानी का विवाह अभिमन्यु से हुआ था और वे कृष्ण से गुप्त रूप से मिलने जाती थीं। द्वारका में कृष्ण विवाहित हैं और राधारानी से, जिन्हें सत्यभामा के नाम से जाना जाता है, गुप्त रूप से मिलने जाते हैं। इस प्रकार कृष्ण वह विपरीत रस का आनंद ले रहे थे जो उन्होंने वृंदावन में लिया था।
इस पुस्तक में आपको श्रीमती राधारानी और श्री कृष्ण की अनेक छोटी-छोटी लीलाओं का वर्णन मिलेगा।
मैं श्रीमती राधारानी के विषय पर लिखने के लिए इतना योग्य नहीं हूँ। फिर भी मैंने "श्रीमती राधारानी की महिमा एवं लीलाएँ" पुस्तक का यह दूसरा भाग तैयार किया है। जब मैं ये सभी पुस्तकें पढ़ रहा था, तो मुझे बहुत आनंद आया। मैंने सोचा कि राधारानी के भक्त भी इन सभी लीलाओं को पढ़कर आनंद लेंगे। इस पुस्तक में ये सभी वर्णन गोस्वामियों द्वारा लिखित मूल ग्रंथों के प्रति मेरी समझ के अनुसार हैं। कोई भी विषय को और अधिक बेहतर ढंग से समझने के लिए मूल ग्रंथों का अध्ययन कर सकता है।
मैं श्रीमती राधारानी के चरण कमलों में प्रार्थना करता हूँ कि इस पुस्तक में उनकी लीलाओं के वर्णन में मेरे द्वारा की गई किसी भी लुटि को क्षमा कर दें।
Hindu (हिंदू धर्म) (13516)
Tantra (तन्त्र) (1007)
Vedas (वेद) (716)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2083)
Chaukhamba | चौखंबा (3186)
Jyotish (ज्योतिष) (1554)
Yoga (योग) (1159)
Ramayana (रामायण) (1338)
Gita Press (गीता प्रेस) (724)
Sahitya (साहित्य) (24646)
History (इतिहास) (8976)
Philosophy (दर्शन) (3611)
Santvani (सन्त वाणी) (2621)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist