श्रीमद् भगवद्गीता को पहले भी कई बार पढ़ा है; पर कोरोना काल की तालाबंदी में कुछ गहराई से अध्ययन और मनन करने का सुअवसर मिला। छात्र जीवन से ही कुछ तुकबंदी कर लेता हूं। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण की इस पावन वाणी को अपने शब्दों में लिखने की प्रेरणा हुई। उसी का सुपरिणाम है 442 छंदों वाली ये काव्यावलि। इसे लिखने से कोरोना-काल में मुझे भरपूर मानसिक शक्ति मिली। आशा है पाठकों को भी इससे लाभ होगा।
यह धर्मग्रंथ नहीं है। इसमें अनेक भूल और व्याकरण संबंधी अशुद्धियां भी होंगी। इसलिए पाठकों से प्रार्थना है कि वे इसे भगवान श्रीकृष्ण के चरणों मे समर्पित एक पुष्प मानकर ही पढ़ें।
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